कथा कुंज : "धैर्य का दीपक"
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गंगा नदी के किनारे एक छोटा-सा गांव था, जहां गुरु दयानंद अपनी साधना कुटी में रहते थे। उनके पास हर दिन सैकड़ों शिष्य आते थे, लेकिन एक खास युवक, अर्जुन, हमेशा प्रश्नों से भरा हुआ आता।
एक दिन, अर्जुन ने गुरु से पूछा, "गुरुदेव, जीवन का अर्थ क्या है? मैं इसे समझना चाहता हूं।"
गुरु मुस्कराए और बोले, "अर्जुन, कल सुबह सूर्योदय से पहले नदी किनारे आना। तुम्हें उत्तर मिलेगा।"
अर्जुन रातभर उत्साह से भरा रहा। अगले दिन, जब वह नदी किनारे पहुंचा, गुरु उसे वहां एक जलता हुआ दीपक सौंपकर बोले, "इसे लेकर नदी पार करो। लेकिन ध्यान रहे, दीपक बुझना नहीं चाहिए।"
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अर्जुन ने दीपक को संभालते हुए कदम बढ़ाए। नदी पार करने में उसे बहुत संघर्ष करना पड़ा। तेज हवा, नदी की धार, और उसकी खुद की बेचैनी ने उसे कई बार भयभीत किया, लेकिन उसने दीपक को बुझने नहीं दिया।
जब वह दूसरी ओर पहुंचा, तो गुरु पहले से वहां खड़े थे। अर्जुन ने उत्सुकता से पूछा, "गुरुदेव, अब उत्तर बताइए। जीवन का अर्थ क्या है?"
गुरु ने हंसते हुए कहा, "तुमने इसे पहले ही समझ लिया है। जैसे तुमने दीपक को बुझने नहीं दिया, वैसे ही जीवन का दीपक तुम्हारे धैर्य, ध्यान और प्रयास से ही जलता है। इसे जलाए रखना ही जीवन है।"
अर्जुन को उत्तर मिल गया। वह अब समझ चुका था कि जीवन बाहरी संघर्षों से लड़ते हुए भीतर की रोशनी बचाए रखने का नाम है।
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