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गुरुवार, 1 मई 2025

* भगवान शिव का महा नशा : परम् आनंद समाधि *

ॐ नमः शिवाय

यह कोई भांग, गांजा या शराब का नशा नहीं है..!

यह कोई भांग का नशा नहीं, तू
यह गांजा का नशा नहीं,
यह कोई शराब का नशा भी नहीं है।

शिवजी... बैठे हैं,
झूम रहे हैं मस्ती में—
कोई कहता है उन्होंने भांग पी है,
कोई कहता है उन्होंने चिलम लगा ली है,
गंजेड़ी कहता है – "बाबा ने लंबा कश लगा लिया है..."

लेकिन...
नशा वो नहीं जो चिलम में हो,
वो तो कृत्रिम है....
नशा वो नहीं जो भांग में हो,
वो भी कृत्रिम है...

शिव जी को जो नशा है,
वो तो है समाधि का नशा है...!
वो है परम आनंद का नशा है...!

नशा है... नशा... है...!!

कोई उन्हें ध्यानस्थ देखता है,
कोई उन्हें तांडव करते देखता है,
कोई उन्हें मौन में,
कोई उन्हें नृत्य में देखता है—
लेकिन हर रूप में, हर क्षण में,
वो महा समाधि के नशे में डूबे हैं...!

भोले नाथ का नशा...
नशा है... नशा है... नशा है....!!


अब जब आप "ॐ नमः शिवाय" कहें,
तो पहले स्वयं को कहें,
क्योंकि आपका शरीर—
"बॉडी इज़ द टेम्पल ऑफ गॉड",
शरीर ईश्वर का मंदिर है...!

बाहर नहीं,
भीतर साधना कीजिए....!

ध्यान कीजिए, योग कीजिए,
तपस्या कीजिए, भक्ति कीजिए,
समर्पण कीजिए—
कुछ भी कीजिए,
अगर सच्चे मन से करेंगे तो
आपके भीतर घटित होगा...!

भक्ति घटित होगी,
ध्यान घटित होगा।
और जो घटित होगा,
वो होगा—परमानंद...!

यह परमानंद नित्य है,
स्थायी है...
सुख और दुख तो इस जगत में अनित्य हैं—
आते हैं, जाते हैं...

लेकिन परमानंद...
वो सदा आपके साथ रहेगा....


बस, यही कहना था—

आपको मेरा नमस्कार..!
जय हो।

- "अनित्यसर्व"